Friday, 25 February 2011

मेरी आवाज...

गर फिक्र होती उजाले की मुझको ,रातों में मेरे अँधेरा न होता,
जो ताड़ जाता मैं वक्त-ऐ-तकाज़ा,निशा-ऐ-पहर का घनेरा न होता,
जो पास होते अगर ज्ञान चक्षु ,तो फिर बहकना गंवारा न होता,
रौशन जो करता ये मन का दिया मैं ,तो फिर ये धुंधला नजारा न होता,
जो होता मैं सिंचित अगर अनुभवों से , कड़ी धूप में बेसहारा न होता,
बिख़र जाता "शिशिर" तिनके सा इस दबिश में  ,जो जीवन में तेरा सहारा न होता,

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