Wednesday, 31 October 2012

प्रकृति की गोद से ...

हवाओं की ये खुसर-फुसर ये गुफ्तगू , बहारों की ये शोख़-अदा ये जुस्तजू ,
भौरों का ये क्रंद-विनय ये आरजू , झरनों की ये कल छल-छल ऐ आब तू ,
मेघों का जो रंग-साज यौवन-खुशबू , पौधों का वो वर्ण-हरित श्रृंगार तू ,
दूर तलक फैला वसुधा का आँगन-भू , ह्रदय कहे तेरे आँचल को चूम लूं ...

Wednesday, 10 October 2012

फिर से

होती नहीं बर्दाश्त तेरे नज़रों की तपिश मुझसे, जलाती है ये अरमान जो हैं मेरे दिल में बसे,
रोती हुई ये ऋतु भी अब फरियादी है तुझसे, बुझा न पायी ये शोले जो हैं मेरे दिल में जले ...

Wednesday, 3 October 2012

अमर नीरज साहब

बादल बिजली चन्दन पानी जैसा अपना प्यार,
लेना होगा जनम हमें कई कई बार ...

बात बहुत तेजी से फैली है कि 70 के दशक की हिंदी फिल्म प्रेम पुजारी का ये गाना लिखने वाले नीरज साहब को स्वर्ग से धरती पर लाने की तैयारी चल रही है। पता करने पर पता चला कि बादल,बिजली,चन्दन और पानी उनको वापस धरती पर लाने की तैयारी में लगे हैं। 

इन पंक्तियों को लिखते वक़्त नीरज साहब की आँखों में उस समय के प्रेम का एक अलग दृश्य था। उन्हें लगा होगा कि ये प्रेम हमेशा से ही पवित्र था और रहेगा लेकिन शायद ये न सोचा हो कि ये पंक्तियाँ हर युग में प्रेम के हर प्रारूप का साथ निभाएंगी और उन्हें इतिहास के पन्नो में अमर बनायेंगी।

नीरज साहब के ज़माने के बादलों की और बात थी। सावन के पहले से ही हल्की बारिश की बूँदें मानो लोगों को सावन की झमाझम बारिश में भीगने का न्योता दे रहीं हो। भाद्रपद की उमस भरी दोपहरी के बाद शाम को बारिश से ठंडी हुई हवा के क्या कहने थे। पर अब तो लोग बादलों की ओर टकटकी लगाये बैठे रहते हैं जैसे उन से पूछ रहे हों की तुममे से कौन से बादल का "हाल्ट" यहाँ पर है। बादल पहले की तरह विश्वशनीय नहीं रह गए जो कवि घाघ के नियमों को मानते हों. अब तो ये भी अनुमान नहीं लगा सकते की एक ही रंग के बादलों में से कौन सा बरसेगा। किसानों में वही प्रसन्न हैं जिनके पास "ट्यूबेल" हैं अर्थात कृत्रिम बादल। धनाड्यों के घर में "शावर" कृत्रिम बदल की अनुभूति करते हैं।

बिजली की बात पर नीरज साहब से मैं कुछ असहमत हूँ। इनके ज़माने में भी बिजली की व्यवस्था कोई इतनी अच्छी नहीं थी। बिजली का कोई निर्धारित समय नहीं था और वो आज भी नहीं है अलबत्ता इनके ज़माने में जब बिजली आती थी तो ये निश्चित था की कुछ देर रहेगी जैसे कह रही हो की जब मैं साथ देती हूँ तो कमर तोड़ के। पर आज बिजली की हालत देखता हूँ तो अपनी तरफ की "डांस पार्टी" में नाचने वाली बिजली बाई की याद आती है जो पैसों के लिए कभी इनके तो कभी उनके पास जाकर ठुमके लगा आती है। स्पष्ट है बिजली की स्थिति भी। पैसे वालों के लिए "जेनेरेटर" सुविधा उपलब्ध है यानि कृत्रिम बिजली। 

चन्दन की बात से मुझे अपने बचपन का सरदर्द याद आता है जब सर पे चन्दन लगाया जाता था और उसकी ठंधक से सर दर्द में बहुत आराम मिलता था। नीरज साहब का भी शायद यही पर्याय रहा हो। 
परन्तु अब का चन्दन भुजंग के लिपटे रहने से विष-व्याप्त हो गया है। घर के बगल में एक सज्जन ने यही नुस्खा अपनाना चाहा सरदर्द में तो उनके सर पे छोटे-बड़े दाने निकल आये। पता चला कि  ये चन्दन नहीं कुछ और था। संपन्न के लिए "असली" चन्दन अभी भी उपलब्ध है। 


पानी की बात करना ही व्यर्थ है। नीरज साहब के ज़माने की निर्मल धार की जगह आज के मल-धार ने ले ली है। और धार क्या ? धार भी अब कहाँ देखने को मिलती है और मिलती भी है तो बाढ़ ग्रस्त इलाकों में। मैं जनता हूँ की ये लेख पढ़ने वाला हर व्यक्ति पानी "फिल्टर" करकेपीता है। समर्थवान के लिए जल भी शुद्ध रूप में उपलब्ध है।


प्रेम का भी यही रूप है। जो समर्थवान है उसे प्रेम उपलब्ध है हर ज़माने में और यह बात इन चारों को समझ में आ गयी है और वे अपने प्रति हुए इस पक्षपात से दुखी हैं। 

सो ये चारों नीरज साहब से अप्रसन्न हैं और कहते हैं कि उन्हें धरती पर लाकर एक गाना लिखवायेंगे जिसमे प्रेम का उदहारण इन चारों को दिया जायेगा।











Saturday, 21 July 2012

बूँदें ...

छम से करतीं आयें बूँदें ,
मेघ संदेश पहुंचाएं बूँदें ,
अम्बर अमृत बरसाएं बूँदें ,
धरा इत्र फैलाएं बूँदें ,
पावन प्रीत जगाएं बूँदें ,
गीत नए सिखलाएँ बूँदें ,
मधु-मदिरा पान कराएँ बूँदें ,
विचलित मन बहलायें बूँदें ,
बच्चों सा खेल दिखाएँ बूँदें ,
बचपन की याद कराएँ बूँदें ,
मन भावन  लोरियां गायें बूँदें ,   
माँ का स्मरण कराएँ बूँदें ,
कर्म-भान करवाएं बूँदें ,
जीने की राह दिखाएँ बूँदें ,
हसें और हंसलायें बूँदें ,
मिल चलना हमें सिखाएं बूँदें , .... जारी रहेगा 








Saturday, 21 April 2012

उत्तर प्रदेश की वर्तमान स्थिति पर

चोरों का खेल रचाया है, संकट की काली छाया है;

समझ मेरे नहीं आया है, जो माया कि ये माया है;
पलटी अपनी जो काया है, मूर्ति जो लगवाया है ;
घर जिसने लूटवाया है, और बेच सभी कुछ खाया है;
इतना भय जो फैलाया है, सोचे उसने क्या पाया है !

अखिलेश वहां जो आया है, लक्ष्मी ने वाहन पाया है ;
सत्ता जिसने हथियाया है, लगता जिसको सब जाया है;
मुलायम की जिस पर छाया है, जो खुद कुछ नहीं कर पाया है;
जनता को जिसने बहलाया है, बिल्ले का स्वांग रचाया है !

"शिशिर" इतना ही कह पाया है, रक्षा करे वो जिसने तुझे बनाया है !