चोरों का खेल रचाया है, संकट की काली छाया है;
समझ मेरे नहीं आया है, जो माया कि ये माया है;
पलटी अपनी जो काया है, मूर्ति जो लगवाया है ;
घर जिसने लूटवाया है, और बेच सभी कुछ खाया है;
इतना भय जो फैलाया है, सोचे उसने क्या पाया है !
अखिलेश वहां जो आया है, लक्ष्मी ने वाहन पाया है ;
सत्ता जिसने हथियाया है, लगता जिसको सब जाया है;
मुलायम की जिस पर छाया है, जो खुद कुछ नहीं कर पाया है;
जनता को जिसने बहलाया है, बिल्ले का स्वांग रचाया है !
"शिशिर" इतना ही कह पाया है, रक्षा करे वो जिसने तुझे बनाया है !