Wednesday, 23 November 2011

सुकून-ए-रूह....

जागतीं हैं जब आँखें हसीन यादों में तमाम रात, सुबहों का आलम भी हदें पार कर जाये ,
वास्ता है तुझे पाक-ए-मोहब्बत की मेरे मालिक, झलक भर मुझे महबूब का दीदार हो जाये...

Sunday, 20 November 2011

इंतजार में ...

पहले ...
इंतजार में जो बैठे थे फिर दीदार के, कि बहुत दूर तक मेरी ये नज़र ढूंढ आती है ,
तमन्ना जो थी पीने की मुझे नज़रों से, कि हर सूरत में दिखती मुझे मेरी साक़ी है ,

बाद में ...

खाली रह गया प्याला जो बीच हाथों के, कि आने की ये उम्मीद भी अब जाती है ,
रूखसत हुआ कहते हुए यही खुद से, कि रूक जाऊं जो ये शाम अभी बाकी है ....






Saturday, 5 November 2011

अनुभव एक शाम का....

हँसी आती है, बदमिजाज ज़माने के नए रंग-ढंग पे ,
लैला-मजनू से ये किस्से पहले भी हुआ करते थे,
फर्क इतना है, मरा करते थे मोहब्बत पाने में वो,
तड़पते हैं ये नामुराद मोहब्बत से कुछ कमाने को ,
जो प्यार था कभी सदियों से अदब 'दर्शन' का ,
वो हो के रह गया महज सबब 'प्रदर्शन' का...















Saturday, 16 April 2011

बचपन ....

बचपन की मीठी बातों में ,
वो इठलाना याद आता है ,
जब बड़ों के कन्धों पे चढ़कर ,
'राजा' बनना याद आता है,
जब माँ की मीठी डांट में भी,
झूठा गुस्सा याद आता है ,
जब शाम को खेल-धमाल के बाद,
धूल-भरा पाँव याद आता है ,
जब दिन की खूब शरारत में ,
बाबा का गुस्सा याद आता है ,
तब लगता है बचपन भला था,
जब पल-छिन मुझे सताता है .




 



Friday, 25 February 2011

मेरी आवाज...

गर फिक्र होती उजाले की मुझको ,रातों में मेरे अँधेरा न होता,
जो ताड़ जाता मैं वक्त-ऐ-तकाज़ा,निशा-ऐ-पहर का घनेरा न होता,
जो पास होते अगर ज्ञान चक्षु ,तो फिर बहकना गंवारा न होता,
रौशन जो करता ये मन का दिया मैं ,तो फिर ये धुंधला नजारा न होता,
जो होता मैं सिंचित अगर अनुभवों से , कड़ी धूप में बेसहारा न होता,
बिख़र जाता "शिशिर" तिनके सा इस दबिश में  ,जो जीवन में तेरा सहारा न होता,