हँसी आती है, बदमिजाज ज़माने के नए रंग-ढंग पे ,
लैला-मजनू से ये किस्से पहले भी हुआ करते थे,फर्क इतना है, मरा करते थे मोहब्बत पाने में वो,
तड़पते हैं ये नामुराद मोहब्बत से कुछ कमाने को ,
जो प्यार था कभी सदियों से अदब 'दर्शन' का ,
वो हो के रह गया महज सबब 'प्रदर्शन' का...
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