Saturday, 21 April 2012

उत्तर प्रदेश की वर्तमान स्थिति पर

चोरों का खेल रचाया है, संकट की काली छाया है;

समझ मेरे नहीं आया है, जो माया कि ये माया है;
पलटी अपनी जो काया है, मूर्ति जो लगवाया है ;
घर जिसने लूटवाया है, और बेच सभी कुछ खाया है;
इतना भय जो फैलाया है, सोचे उसने क्या पाया है !

अखिलेश वहां जो आया है, लक्ष्मी ने वाहन पाया है ;
सत्ता जिसने हथियाया है, लगता जिसको सब जाया है;
मुलायम की जिस पर छाया है, जो खुद कुछ नहीं कर पाया है;
जनता को जिसने बहलाया है, बिल्ले का स्वांग रचाया है !

"शिशिर" इतना ही कह पाया है, रक्षा करे वो जिसने तुझे बनाया है !

2 comments:

  1. Well, subject considered for this poem is quite serious. Poem says the things we all know. It could have been better if you had selected better words and also had added some philosophical or psychological ideas in it. Nonetheless... good job.

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