Friday, 3 September 2010

हवायें....

अभी रोशन हैं चाहत के दीये हम सबकी आँखों में

बुझाने के लिये पागल हवाएँ रोज़ आती हैं......


ये सच है नफ़रतों की आग ने सब कुछ जला डाला

मगर उम्मीद की ठंडी हवाएँ रोज़ आती हैं......

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